• बिहीबार ८-२६-२०७६/Thursday 12-12-2019/ 12:00 pm

'भारत विरोधी राष्ट्रवाद केपी ओलीको हितमा छैन'–एसडी मुनी 

काठमाडौँ । भारतीय थिङ्क ट्याङ्क,दक्षिण एसियाका विज्ञ तथा नेपाल मामलाका विशेष जानकार  एसडी मुनीले नेपालबारे आफ्नो पछिल्लो धारणा एक भारतीय पत्रिका मार्फत सार्वजनिक गरेका छन् । लिम्पियाधुरा क्षेत्रलाई भारतले आफ्नो आधिकारीक नक्सामा पारेपछि सुरु भएको दुई देशबीचको असमझदारीलाई छलफलका माध्यमबाट समाधान गर्नुपर्नेमा उनको जोड छ ।

‘बातचीत करें भारत और नेपाल’ शीर्षकको उनको लेखमा अहिले नेकपा तथा प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओलीले सीमा विवादलाई भारतविरोधी राष्ट्रवादको रुपमा प्रयोग गरिरहेको उनको आरोप छ ।
 

यस्तो छ लेख :  भारत और नेपाल के बीच कई तरह के जमीनी मसले हैं, जिनमें से कालापानी का मसला भी एक है. यह मसला अब सुर्खियों में इसलिए आया है, क्योंकि इसको लेकर पिछले दिनों नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने एक बयान दिया कि कालापानी से भारत अपने सुरक्षा बलों को हटाये, क्योंकि वह नेपाल के हिस्से में आता है. 
 
यह बयान दरअसल इसलिए आया है, क्योंकि पिछले महीने अक्तूबर में भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख यानी दो नये केंद्र शासित प्रदेशों के गठन के बाद देश का नया नक्शा जारी किया था. इस नये नक्शे में कालापानी भारत के हिस्से के रूप में दर्ज है. इसी बात को नवंबर के पहले सप्ताह में नेपाल सरकार ने अपनी आपत्ति दर्ज करायी थी. इस आपत्ति में ओली ने यह कहा कि नेपाल अपनी जमीन पर किसी और को कब्जा नहीं होने देगा. हालांकि, भारत सरकार ने इतना ही कहा है कि संशोधित नक्शे में कोई फेरबदल नहीं किया गया है. 
 
भारत और नेपाल के बीच इस मसले को लेकर अरसे से बातचीत चल रही है और पूर्व में दोनों देशों ने यह तय भी किया है कि दोनों देशों के उस वक्त जो सचिव होंगे, वे मिल कर बात करेंगे और इस मसले का कोई सार्थक हल निकालेंगे. 
 
ऐसे में जब तक यह तय नहीं होता कि करना क्या है, तब तक तो पुरानी स्थिति ही बहाल रहेगी, कालापानी से भारत को सेना हटाने की कोई जरूरत नहीं है. यही वजह है कि भारत ने अभी तक अपने नक्शे में कालापानी को यथावत रखा हुआ है. जाहिर है, जब तक दोनों देशों के बीच कोई बात नहीं बनती और यह तय नहीं हो जाता कि वास्तव में कालापानी किसके हिस्से में रहेगा, तब तक तो केपी शर्मा ओली को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए. 
 
दो देशों के बीच किसी भी जमीन विवाद का हल इस तरह के बयानों से निकलना मुश्किल है. क्योंकि, कालापानी जगह को लेकर भारत के पास अपने कागजात मौजूद हैं और नेपाल का भी अपना टेक है कि वह उसका है. दो पड़ोसी देशों के बीच ऐसे मसले हल करने के लिए जरूरी है कि दोनों देश कोई राजनीतिक मुद्दा बनाने से बचें और मिलकर बातचीत के जरिये किसी ठोस फैसले पर पहुंचें, ताकि दोनों देशों की जनता में किसी तरह का कोई मतभेद न पनपने पाये और दोनों देशों के रिश्ते भी प्रगाढ़ बने रहें. 
 
वहां नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी इस वक्त भारत-विरोध के राष्ट्रवादी रवैये को अपनाये हुए है और वह कालापानी के मसले को हवा दे रहा है. यह उचित नहीं है, न ही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के लिए और न ही केपी शर्मा ओली के लिए.  
 
कालापानी विवाद की तह में जाएं, तो पता चलता है कि दोनों देशों ने कुछ गड़बड़ी की. वहां पर भारत के सैन्य बलों ने बैरिकेट लगाये और नेपालियों को आने से रोका, जिससे नेपाल नाराज है. इस बात पर नेपाल की राजनीति बदल गयी और सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें चीन ने पुरजोर तरीके से अपनी दखल दे दी. यह स्थिति भारत के लिए ठीक नहीं है कि भारत और नेपाल के बीच किसी विवाद को कोई तीसरा देश हवा दे. जाहिर है, इसका नुकसान होना तय है, अगर दोनों देशों ने समझदारी नहीं दिखायी तो. 
 
इस वक्त नेपाल की राजनीति और समाज में 'ग्रेटर नेपाल' को लेकर बात चल रही है. 'ग्रेटर नेपाल' का अर्थ है- प्राचीन नेपाल, यानी वह नेपाल जो भौगोलिक रूप से विस्तृत था. इसी 'ग्रेटर नेपाल' की आज नेपाली लोग मांग कर रहे हैं और इसकी हवा पाकिस्तान और चीन दोनों दे रहे हैं कि नेपाल अपने 'ग्रेटर नेपाल' की बात करे. 
 
एक तरह से देखा जाये, तो चीन और पाकिस्तान मिल कर भारत को गुपचुप तरीके से परेशान कर रहे हैं, जिसमें नेपाल एक जरिया मात्र है. चीन तो बाकायदा नेपाल में इन सबके लिए धनराशि भी मुहैया कराता है. यही वजह है कि नेपाल में इस वक्त भारत-विरोध की लहर चल रही है, जिसके परिणामस्वरूप उसके राजनीतिक बयानों में तल्खी देखी जा रही है. 'ग्रेटर नेपाल' की कल्पना कितनी साकार होगी, इस बारे में कहना तो मुश्किल है, लेकिन इतना जरूर है कि कालापानी के विवाद का निबटारा भारत और नेपाल को आपस में बातचीत के जरिये ही करना चाहिए. 
 
बल्कि भारत को बहुत ही ज्यादा सावधानी से काम लेने की जरूरत है, बिना कोई तीखा तेवर अपनाये. भारत और नेपाल को विवाद बढ़ानेवाली राजनीति से दूर रहना चाहिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच संबंधों का प्रगाढ़ होना हितकारी है. इस वक्त नेपाल में चीन बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लगा रहा है. चीन सांस्कृतिक रूप से नेपाल में भी कई काम कर रहा है. चीन अपने रणनीतिक तरीके से नेपाल में बौद्ध धर्म का प्रसार कर रहा है, चीनी भाषा विस्तार कर रहा है और वहां जल्दी ही स्कूलों में चीनी भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ायी जाने लगेगी. 
 
चीन वहां के नेताओं को धनलाभ दे रहा है और चीन ने ही नेपाल की दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों को एक करने में अपनी महती भूमिका निभायी है. इन सब के चलते नेपाल में चीन की दखल बहुत मजबूत होती जा रही है, जो भारत के लिए निश्चित रूप से अच्छी खबर नहीं है. यह एक ऐसी रणनीति है, जिसका शिकार हर नेपाली हो सकता है, क्योंकि चीन सांस्कृतिक रूप से उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत बना रहा है. 
 
पूरे दक्षिण एशिया में सिर्फ भारत-नेपाल के संबंधों में ही प्रगाढ़ता और सकारात्मकता जरूरी नहीं है, बल्कि बाकी देशों के बीच भी यह होना चाहिए. 
 
भारत और नेपाल की सीमा की बात हो, इनके पुरातन संबंधों की बात हो या फिर दोनों देशों के भविष्य में रिश्ते कैसे होंगे इसकी बात हो, नेपाल का साथ रहना हमारे लिए जरूरी है. नेपाल का साठ-सत्तर प्रतिशत व्यापार भारत से ही होता है. नेपाल के करीब एक करोड़ लोग भारत में रहते हैं, जिनका आना-जाना लगा रहता है. लेकिन नेपाल अब चीन के साथ सड़क बना रहा है, हालांकि इसमें अभी समय है. 
 
नेपाल और चीन के बीच भौगोलिक दूरी ढाई-तीन हजार किमी का है, जबकि नेपाल-भारत के बीच बंदरगाहों का फासला हजार किलोमीटर से भी कम है. ऐसे में कौन व्यापारी ज्यादा पैसा देकर उतनी दूर चीन से मंगवायेगा, यह एक राजनीतिक बात है. चीन के नेपाल में दखल से भारत के एतबार से सुरक्षा का बड़ा खतरा है. ऐसे में दोनों देशों के हित में यही होगा कि संबंध अच्छे बने रहें, ताकि तीसरा फायदा न उठा पाये. गौरतलब है कि नेपाल की निर्भरता भारत पर है, जो दस-बीस सालों में खत्म नहीं होनेवाली है. 
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)

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